Health – Khabar Danadan https://khabardanadan.com National News Portal Sat, 05 Sep 2026 10:16:51 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1 https://khabardanadan.com/wp-content/uploads/2024/11/favicon-150x150.jpg Health – Khabar Danadan https://khabardanadan.com 32 32 देश में बढ़ रहा स्वाइन फ्लू का खतरा, बुखार नहीं तो भी इन संकेतों पर रहें अलर्ट https://khabardanadan.com/rising-threat-of-swine-flu-in-the-country-stay-alert-to-these-signs-even-in-the-absence-of-fever/ https://khabardanadan.com/rising-threat-of-swine-flu-in-the-country-stay-alert-to-these-signs-even-in-the-absence-of-fever/#respond Sat, 05 Sep 2026 10:16:51 +0000 https://khabardanadan.com/?p=19102

देश के कई हिस्सों में इन दिनों इन्फ्लुएंजा-ए के H1N1 वायरस को लेकर चिंता बढ़ी हुई है। दिल्ली-एनसीआर के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में स्वाइन फ्लू के मामले सामने आ रहे हैं। अगस्त के अंत तक दिल्ली में संक्रमितों का आंकड़ा 3200 के पार पहुंच गया था, जबकि उत्तर प्रदेश में 2 सितंबर तक H1N1 के 685 मामलों की प्रयोगशाला जांच में पुष्टि हो चुकी थी। कुछ राज्यों में संक्रमण से मौत के मामले भी सामने आए हैं।

हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादातर मरीजों में संक्रमण के लक्षण हल्के होते हैं और घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, डायबिटीज के मरीजों और पहले से किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों में फ्लू ज्यादा परेशानी पैदा कर सकता है।

सिर्फ तेज बुखार को न मानें फ्लू का संकेत

स्वाइन फ्लू का नाम आते ही आमतौर पर तेज बुखार, खांसी और बदन दर्द जैसे लक्षण ध्यान में आते हैं। लेकिन H1N1 संक्रमण की पहचान केवल बुखार के आधार पर नहीं की जा सकती। कई मामलों में व्यक्ति को बुखार नहीं होता, फिर भी वह इन्फ्लुएंजा से संक्रमित हो सकता है।

अमेरिकी सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के अनुसार कुछ लोगों में फ्लू से जुड़े सांस संबंधी लक्षण बुखार के बिना भी दिखाई दे सकते हैं। ऐसे में लगातार खांसी, गले में खराश, नाक बहना या बंद होना, सिरदर्द और असामान्य थकान जैसे संकेतों को सामान्य सर्दी-जुकाम समझकर टालना ठीक नहीं है।

हर मरीज में एक जैसे लक्षण नहीं होते

H1N1 संक्रमण के लक्षण व्यक्ति की उम्र और स्वास्थ्य स्थिति के हिसाब से अलग-अलग हो सकते हैं। बुजुर्गों में फ्लू होने के बावजूद बुखार न आना संभव है। ऐसे मरीजों में भूख कम लगना, कमजोरी या अन्य सामान्य लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

वहीं बच्चों में सांस से जुड़े लक्षणों के साथ उल्टी और दस्त जैसी परेशानियां भी देखने को मिल सकती हैं। इसलिए केवल किसी एक लक्षण की मौजूदगी या अनुपस्थिति से H1N1 संक्रमण की पुष्टि नहीं की जा सकती।

लक्षण दिखने पर खुद से न करें बीमारी का अनुमान

फैमिली फिजिशियन डॉ. अरविंद डबास के मुताबिक खांसी, गले में खराश, नाक बंद होना और थकान जैसे लक्षण केवल फ्लू में ही नहीं, बल्कि कई दूसरे सांस संबंधी संक्रमणों में भी हो सकते हैं। ऐसे में सिर्फ लक्षणों के आधार पर यह तय करना मुश्किल है कि मरीज H1N1 से संक्रमित है या नहीं।

जरूरत पड़ने पर डॉक्टर फ्लू की पुष्टि के लिए जांच कराने की सलाह दे सकते हैं। इसके लिए रैपिड फ्लू टेस्ट के अलावा मॉलिक्यूलर टेस्ट भी उपलब्ध हैं। मॉलिक्यूलर टेस्ट वायरस के आनुवंशिक पदार्थ यानी वायरल RNA की पहचान करता है और आमतौर पर रैपिड एंटीजन टेस्ट की तुलना में ज्यादा संवेदनशील माना जाता है।

हालांकि प्रत्येक मरीज के लिए जांच जरूरी नहीं होती। डॉक्टर मरीज के लक्षण, संक्रमण के संपर्क में आने की संभावना और उसकी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए जांच की जरूरत तय करते हैं।

सांस लेने में दिक्कत हो तो तुरंत लें डॉक्टर की सलाह

विशेषज्ञों के मुताबिक बुखार न होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को फ्लू नहीं हो सकता। खासतौर पर बुजुर्गों और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों में बिना बुखार के भी इन्फ्लुएंजा संक्रमण हो सकता है। कुछ मामलों में संक्रमण गंभीर रूप भी ले सकता है।

यदि फ्लू जैसे लक्षण तेजी से बढ़ रहे हों, सांस लेने में परेशानी हो, अत्यधिक कमजोरी महसूस हो या हालत बिगड़ती नजर आए तो बिना देरी किए डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। कुछ मरीजों में डॉक्टर की सलाह पर एंटीवायरल दवाओं का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

संक्रमण फैलने के खतरे को भी समझें

H1N1 को लेकर एक महत्वपूर्ण बात यह है कि संक्रमित व्यक्ति को बीमारी का स्पष्ट पता चलने से पहले भी वायरस दूसरों तक पहुंच सकता है। संक्रमण के शुरुआती दिनों में इसके फैलने की संभावना अधिक रहती है।

इसलिए फ्लू जैसे लक्षण दिखाई देने पर केवल बुखार का इंतजार करना सही रणनीति नहीं है। खांसी, गले में खराश, नाक संबंधी परेशानी और असामान्य थकान जैसे संकेतों पर भी ध्यान दें और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह लें।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की राय के आधार पर तैयार किया गया है। इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प न माना जाए।

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बच्चे की हाइट नहीं बढ़ रही? सिर्फ खान-पान को न मानें वजह, इन संकेतों पर दें खास ध्यान https://khabardanadan.com/is-your-child-not-growing-taller-dont-attribute-it-solely-to-diet-pay-close-attention-to-these-signs/ https://khabardanadan.com/is-your-child-not-growing-taller-dont-attribute-it-solely-to-diet-pay-close-attention-to-these-signs/#respond Fri, 04 Sep 2026 11:27:14 +0000 https://khabardanadan.com/?p=19075

बच्चे की उम्र बढ़ने के साथ उसकी लंबाई में भी बदलाव होना सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन अगर उम्र के हिसाब से बच्चे की हाइट में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो रही है, तो माता-पिता का चिंतित होना स्वाभाविक है। कई बार कम लंबाई का कारण आनुवंशिक होता है और बच्चा पूरी तरह स्वस्थ रहता है। वहीं, कुछ मामलों में धीमी ग्रोथ शरीर में पोषण की कमी, हार्मोनल समस्या या किसी अन्य स्वास्थ्य परेशानी का संकेत भी हो सकती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, बच्चे की हाइट का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि वह अपने दोस्तों या हमउम्र बच्चों से कितना छोटा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह देखना है कि बच्चे की ग्रोथ समय के साथ किस गति से हो रही है। यदि बच्चा लगातार अपनी सामान्य ग्रोथ रफ्तार से बढ़ रहा है, तो कम कद कई बार सामान्य शारीरिक विशेषता हो सकता है।

माता-पिता की हाइट का भी पड़ता है असर

बच्चे की लंबाई निर्धारित करने में आनुवंशिकता की बड़ी भूमिका होती है। यदि माता-पिता दोनों की लंबाई अपेक्षाकृत कम है, तो बच्चे की हाइट भी स्वाभाविक रूप से कम रह सकती है। ऐसे मामलों में बच्चा स्वस्थ होने के बावजूद अपने हमउम्र बच्चों की तुलना में छोटा नजर आ सकता है।

कुछ बच्चों में शारीरिक विकास और किशोरावस्था की शुरुआत थोड़ी देर से होती है। ऐसे बच्चों में बाद के वर्षों में ग्रोथ स्पर्ट देखने को मिल सकता है और वे आगे चलकर सामान्य लंबाई हासिल कर सकते हैं।

पोषण की कमी भी हो सकती है वजह

बच्चे के शारीरिक विकास के लिए पर्याप्त कैलोरी, प्रोटीन, विटामिन और मिनरल जरूरी होते हैं। लंबे समय तक संतुलित आहार न मिलने की स्थिति में ग्रोथ प्रभावित हो सकती है। आयरन, आयोडीन और विटामिन ए जैसे माइक्रोन्यूट्रिएंट्स भी सामान्य वृद्धि और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हालांकि, बच्चे की हाइट कम देखकर अपने स्तर पर विटामिन या अन्य सप्लीमेंट शुरू करना उचित नहीं है। डॉक्टर बच्चे के खान-पान, विकास की रफ्तार और अन्य लक्षणों का आकलन करने के बाद ही किसी पोषक तत्व की कमी की जांच या सप्लीमेंट की सलाह देते हैं।

कुछ बीमारियों का संकेत भी हो सकती है धीमी ग्रोथ

अगर बच्चे की लंबाई बढ़ने की रफ्तार लगातार कम हो रही है, तो इसके पीछे कोई स्वास्थ्य समस्या भी हो सकती है। सीलिएक डिजीज, लंबे समय तक रहने वाली आंतों या किडनी की बीमारी, एनीमिया और हड्डियों से जुड़ी कुछ समस्याएं बच्चे के विकास को प्रभावित कर सकती हैं।

इसके अलावा हाइपोथायरॉइडिज्म और ग्रोथ हार्मोन की कमी जैसी हार्मोन संबंधी परेशानियां भी धीमी ग्रोथ का कारण बन सकती हैं। कुछ मामलों में आनुवंशिक स्थितियां भी बच्चे की लंबाई को प्रभावित करती हैं।

किन संकेतों को नजरअंदाज न करें?

यदि बच्चा लगातार अपनी उम्र के मुकाबले बहुत छोटा है या पहले की तुलना में उसकी ग्रोथ की रफ्तार कम हो गई है, तो बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है। खासतौर पर हाइट कम होने के साथ वजन भी कम हो रहा हो या बच्चे को लंबे समय से पेट दर्द, दस्त, कमजोरी अथवा अत्यधिक थकान जैसी समस्याएं रहती हों, तो चिकित्सकीय जांच जरूरी हो सकती है।

डॉक्टर आमतौर पर बच्चे की ग्रोथ हिस्ट्री, माता-पिता की लंबाई, जन्म से जुड़ी जानकारी, खान-पान और अन्य लक्षणों का मूल्यांकन करते हैं। जरूरत पड़ने पर कुछ जांचों के जरिए धीमी ग्रोथ के वास्तविक कारण का पता लगाया जाता है।

हर छोटा कद बीमारी नहीं

सबसे जरूरी बात यह है कि कम हाइट को तुरंत किसी बीमारी से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। कई स्वस्थ बच्चों की लंबाई आनुवंशिक कारणों से कम होती है। चिंता का मुख्य कारण तब होता है, जब बच्चे की ग्रोथ की रफ्तार लगातार धीमी हो रही हो या उसके साथ अन्य स्वास्थ्य संबंधी लक्षण भी दिखाई दे रहे हों।

इसलिए बच्चे की लंबाई को लेकर चिंता होने पर खुद से दवा या सप्लीमेंट देने के बजाय विशेषज्ञ चिकित्सक से सलाह लेना ज्यादा सुरक्षित और सही तरीका है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सामान्य जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या या बच्चे की ग्रोथ को लेकर चिंता होने पर योग्य चिकित्सक से सलाह लें।

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डायबिटीज में सिर्फ दवा नहीं, डाइट भी जरूरी, इन चीजों का रखें खास ध्यान https://khabardanadan.com/for-diabetes-diet-is-just-as-important-as-medication-pay-special-attention-to-these-things/ https://khabardanadan.com/for-diabetes-diet-is-just-as-important-as-medication-pay-special-attention-to-these-things/#respond Thu, 03 Sep 2026 07:23:16 +0000 https://khabardanadan.com/?p=19030

डायबिटीज को नियंत्रित रखना सिर्फ दवाइयां लेने तक सीमित नहीं है। रोजाना की डाइट, खाने की मात्रा और भोजन का समय भी ब्लड शुगर मैनेजमेंट में अहम भूमिका निभा सकते हैं। गलत खान-पान से ग्लूकोज का स्तर तेजी से बढ़ सकता है, जबकि संतुलित और पौष्टिक भोजन शरीर को स्वस्थ रखने में मदद कर सकता है।

डायबिटीज से जूझ रहे लोगों के लिए यह समझना जरूरी है कि हर व्यक्ति की डाइट एक जैसी नहीं हो सकती। उम्र, वजन, शारीरिक गतिविधि, दवाइयों और अन्य स्वास्थ्य स्थितियों के आधार पर खान-पान की जरूरत बदल सकती है। इसलिए डाइट में बड़े बदलाव करने से पहले डॉक्टर या योग्य डाइटिशियन की सलाह लेना जरूरी है।

ब्लड शुगर कंट्रोल में डाइट क्यों है जरूरी?

डायबिटीज में शरीर इंसुलिन का सही इस्तेमाल नहीं कर पाता या पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता। ऐसे में भोजन से मिलने वाले कार्बोहाइड्रेट का ब्लड ग्लूकोज पर सीधा असर पड़ सकता है। संतुलित डाइट न केवल ब्लड शुगर को मैनेज करने में मदद कर सकती है, बल्कि वजन, ब्लड प्रेशर और हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में भी उपयोगी हो सकती है।

1. कार्बोहाइड्रेट की मात्रा और गुणवत्ता पर दें ध्यान

कार्बोहाइड्रेट वाले खाद्य पदार्थ खाने के बाद ब्लड शुगर बढ़ सकता है। इसलिए डायबिटीज में केवल कार्बोहाइड्रेट की मात्रा ही नहीं, बल्कि उसके स्रोत पर भी ध्यान देना चाहिए। साबुत अनाज, दालें, सब्जियां और फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थ बेहतर विकल्प हो सकते हैं।

2. मीठे और ज्यादा प्रोसेस्ड फूड से दूरी

मिठाइयां, शुगर वाले पेय, मीठी ड्रिंक्स और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ ब्लड शुगर मैनेज करना मुश्किल बना सकते हैं। ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन कम करना और अतिरिक्त चीनी की मात्रा पर नजर रखना फायदेमंद हो सकता है।

3. खाने में फाइबर को बनाएं हिस्सा

फाइबर युक्त भोजन लंबे समय तक पेट भरा होने का एहसास दे सकता है। सब्जियां, दालें, फल और साबुत अनाज इसके अच्छे स्रोत हैं। डाइट में पर्याप्त फाइबर शामिल करने से अनावश्यक स्नैकिंग और ज्यादा खाने से बचने में भी मदद मिल सकती है।

4. प्रोटीन और हेल्दी फैट को न करें नजरअंदाज

डायबिटीज की डाइट का मतलब केवल चावल, रोटी या अन्य कार्बोहाइड्रेट कम करना नहीं है। दाल, बीन्स, अंडे, मछली, कम वसा वाले डेयरी उत्पाद, नट्स और बीज जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थ संतुलित डाइट का हिस्सा हो सकते हैं। हालांकि, इनकी सही मात्रा व्यक्ति की जरूरत और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार तय की जानी चाहिए।

5. भोजन का समय और मात्रा भी मायने रखती है

ब्लड शुगर मैनेजमेंट में सिर्फ यह महत्वपूर्ण नहीं है कि क्या खाया जा रहा है, बल्कि कितनी मात्रा में और किस समय खाया जा रहा है, यह भी मायने रख सकता है। खासतौर पर इंसुलिन या कुछ विशेष डायबिटीज दवाएं लेने वाले लोगों को बिना सलाह के भोजन छोड़ने या डाइट में अचानक बदलाव करने से बचना चाहिए।

डायबिटीज में इन बातों का रखें ध्यान
खाने की प्लेट में सब्जियों और फाइबर वाले खाद्य पदार्थों को पर्याप्त जगह दें।
साबुत अनाज और दालों जैसे पौष्टिक विकल्पों को प्राथमिकता दें।
मीठे पेय और अतिरिक्त चीनी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करें।
भोजन की मात्रा पर नजर रखें और जरूरत से ज्यादा खाने से बचें।
शरीर को हाइड्रेट रखने के लिए पर्याप्त पानी पिएं।
नियमित शारीरिक गतिविधि को अपनी दिनचर्या में शामिल करें।
ब्लड शुगर की रीडिंग के आधार पर डाइट में बदलाव डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह से ही करें।
जरूरी बात

डायबिटीज का प्रबंधन हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है। इसलिए किसी दूसरे व्यक्ति की डाइट को देखकर उसे अपनी दिनचर्या में लागू करना सही नहीं है। दवा, इंसुलिन या खान-पान में बदलाव विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार करना बेहतर है।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। यह किसी चिकित्सकीय परामर्श का विकल्प नहीं है।

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सिगरेट का धुआं सिर्फ फेफड़ों नहीं, किडनी को भी पहुंचा सकता है नुकसान, बढ़ सकता है गंभीर बीमारी का खतरा https://khabardanadan.com/cigarette-smoke-can-harm-not-only-the-lungs-but-also-the-kidneys-potentially-increasing-the-risk-of-serious-illness/ https://khabardanadan.com/cigarette-smoke-can-harm-not-only-the-lungs-but-also-the-kidneys-potentially-increasing-the-risk-of-serious-illness/#respond Wed, 02 Sep 2026 11:24:24 +0000 https://khabardanadan.com/?p=19002

धूम्रपान को अक्सर फेफड़ों की बीमारी और कैंसर से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसका असर शरीर के कई दूसरे महत्वपूर्ण अंगों पर भी पड़ सकता है। सिगरेट के धुएं के साथ शरीर में पहुंचने वाले हानिकारक रसायन रक्त प्रवाह के जरिए अलग-अलग अंगों तक पहुंचते हैं। इनमें किडनी भी शामिल है, जो शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने और तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक तंबाकू का सेवन शरीर के लगभग हर अंग को नुकसान पहुंचा सकता है। इससे कैंसर, हृदय रोग, स्ट्रोक और फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। लंबे समय तक धूम्रपान करने वालों में किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होने का जोखिम भी बढ़ सकता है।

किडनी तक कैसे पहुंचता है सिगरेट का नुकसान?

किडनी लगातार रक्त को फिल्टर करने का काम करती है। इसके साथ ही यह शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट का संतुलन बनाए रखने तथा ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में भी मदद करती है। ऐसे में रक्त प्रवाह से जुड़ी किसी भी समस्या का असर किडनी के कामकाज पर पड़ सकता है।

सिगरेट में मौजूद निकोटीन रक्त वाहिकाओं को संकुचित कर सकता है। इससे ब्लड प्रेशर बढ़ने और किडनी तक रक्त पहुंचने की प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका रहती है। धूम्रपान शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन से जुड़ी प्रक्रियाओं को भी बढ़ावा दे सकता है, जो लंबे समय में किडनी के ऊतकों और उनकी कार्यक्षमता को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

कुछ अध्ययनों में धूम्रपान और क्रॉनिक किडनी डिजीज के बीच संबंध पाया गया है। खासतौर पर जिन लोगों को पहले से डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्या है, उनमें धूम्रपान किडनी से जुड़े जोखिम को और बढ़ा सकता है।

रक्त वाहिकाओं पर भी पड़ता है असर

धूम्रपान का प्रभाव केवल किडनी के फिल्टरिंग सिस्टम तक सीमित नहीं रहता। सिगरेट का धुआं रक्त वाहिकाओं की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचाने वाली प्रक्रियाओं को बढ़ावा दे सकता है। इसके अलावा रक्त के थक्के बनने की प्रवृत्ति बढ़ने और रक्त संचार प्रभावित होने जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं।

किडनी को अपना काम ठीक से करने के लिए पर्याप्त रक्त और ऑक्सीजन की जरूरत होती है। लंबे समय तक रक्त वाहिकाओं पर पड़ने वाला प्रतिकूल प्रभाव किडनी की सामान्य कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है।

दिल और दिमाग पर भी बढ़ता है खतरा

धूम्रपान का असर शरीर के पूरे कार्डियोवस्कुलर सिस्टम पर पड़ सकता है। रक्त वाहिकाओं के प्रभावित होने से हृदय और मस्तिष्क तक रक्त पहुंचाने वाली नसों पर भी असर पड़ सकता है। इससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है।

इसके अलावा धूम्रपान शरीर में ट्राइग्लिसराइड और खराब कोलेस्ट्रॉल के स्तर को प्रभावित कर सकता है, जिससे हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ने की आशंका रहती है।

सिर्फ लंग कैंसर तक सीमित नहीं है खतरा

सिगरेट को फेफड़ों के कैंसर का प्रमुख जोखिम कारक माना जाता है, लेकिन तंबाकू का नुकसान केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं है। तंबाकू के धुएं में हजारों रसायन मौजूद होते हैं, जिनमें कई स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक माने जाते हैं। लंबे समय तक तंबाकू के संपर्क में रहने से शरीर के अलग-अलग हिस्सों में कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।

धूम्रपान का असर इम्यून सिस्टम, मुंह और मसूड़ों की सेहत, प्रजनन क्षमता और हड्डियों सहित शरीर की कई अन्य प्रणालियों पर भी पड़ सकता है।

धूम्रपान छोड़ना क्यों जरूरी?

धूम्रपान से होने वाले नुकसान को देखते हुए इसे छोड़ना स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। खासकर डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या पहले से किडनी संबंधी समस्या वाले लोगों के लिए तंबाकू से दूरी बनाना बेहद जरूरी है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य संबंधी अध्ययनों में सामने आई जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या या धूम्रपान छोड़ने के लिए डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित है।

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मामूली सर्दी-जुकाम समझकर न करें नजरअंदाज, ये लक्षण हो सकते हैं साइनस संक्रमण के संकेत https://khabardanadan.com/do-not-ignore-it-thinking-it-is-just-a-common-cold-these-symptoms-could-be-signs-of-a-sinus-infection/ https://khabardanadan.com/do-not-ignore-it-thinking-it-is-just-a-common-cold-these-symptoms-could-be-signs-of-a-sinus-infection/#respond Tue, 01 Sep 2026 09:33:41 +0000 https://khabardanadan.com/?p=18959

बदलते मौसम में नाक बंद होना, छींक आना और सिरदर्द जैसी परेशानियां आम हैं। अक्सर लोग इन्हें सामान्य सर्दी-जुकाम मानकर घरेलू उपायों से ठीक होने का इंतजार करते हैं। हालांकि, अगर नाक बंद रहने के साथ चेहरे पर दबाव, गाढ़ा बलगम या सिर में लगातार दर्द बना हुआ है और समस्या कई दिनों तक दूर नहीं हो रही, तो मामला साइनस संक्रमण का भी हो सकता है। ऐसे लक्षणों को लंबे समय तक नजरअंदाज करना परेशानी को बढ़ा सकता है।

साइनस हमारी खोपड़ी के अंदर आंखों, नाक, माथे और गालों के आसपास मौजूद हवा से भरी छोटी-छोटी गुहाएं होती हैं। इनका संबंध सांस लेने और आवाज की गूंज से भी होता है। सामान्य स्थिति में इनकी अंदरूनी सतह बलगम बनाती है, जो छोटे मार्गों के जरिए नाक तक पहुंचकर बाहर निकल जाता है। लेकिन सूजन आने पर इन रास्तों में रुकावट पैदा हो सकती है और बलगम जमा होने लगता है।

कैसे शुरू होती है साइनस की समस्या?

साइनस संक्रमण की शुरुआत कई बार सामान्य वायरल सर्दी-जुकाम के बाद होती है। संक्रमण या एलर्जी के कारण नाक और साइनस की अंदरूनी परत में सूजन आ जाती है। इससे बलगम बाहर निकलने में परेशानी होती है और साइनस के भीतर दबाव बढ़ने लगता है।

अधिकतर मामलों में संक्रमण वायरस से जुड़ा होता है, जबकि कुछ परिस्थितियों में बैक्टीरिया भी इसकी वजह बन सकते हैं। इसके अलावा नाक की अंदरूनी संरचना में बदलाव, जैसे नाक की हड्डी का टेढ़ापन, भी बार-बार होने वाली साइनस की समस्या में भूमिका निभा सकता है।

किन संकेतों से पहचानें साइनस संक्रमण?

साइनस की परेशानी होने पर नाक और चेहरे के आसपास इसके लक्षण ज्यादा स्पष्ट नजर आ सकते हैं। नाक लंबे समय तक बंद रहना, गाढ़ा या ज्यादा मात्रा में नाक का स्राव, सिर में दर्द और चेहरे पर दबाव महसूस होना इसके प्रमुख संकेत हैं।

कुछ लोगों में गालों, माथे या आंखों के आसपास दर्द या भारीपन महसूस हो सकता है। इसके साथ सूंघने की क्षमता कमजोर पड़ना, गले में बलगम पहुंचना, खांसी और थकान जैसी शिकायतें भी हो सकती हैं। कभी-कभी स्वाद महसूस करने की क्षमता में भी बदलाव आ सकता है।

अगर लक्षण लगातार बने रहें, बार-बार वापस आएं या समय के साथ ज्यादा गंभीर होते जाएं, तो डॉक्टर से जांच और उचित सलाह लेना बेहतर रहता है।

किन लोगों में ज्यादा हो सकता है खतरा?

जिन लोगों को बार-बार सर्दी-जुकाम, एलर्जी या नाक बंद होने की शिकायत रहती है, उनमें साइनस से जुड़ी समस्या होने की संभावना बढ़ सकती है। नाक के रास्ते में लगातार रुकावट या उसकी संरचना से जुड़ी परेशानी भी जोखिम बढ़ा सकती है।

इसके अलावा धूल, धुआं और वायु प्रदूषण के संपर्क में ज्यादा रहने से नाक की अंदरूनी परत में जलन और सूजन हो सकती है। फफूंद, धूल या अन्य एलर्जेन से संवेदनशील लोगों में भी साइनस की समस्या दोबारा होने की आशंका रहती है।

बचाव के लिए किन बातों का रखें ध्यान?

साइनस की परेशानी से बचने के लिए शरीर को पर्याप्त हाइड्रेटेड रखना, व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखना और धूल-धुएं तथा प्रदूषित वातावरण से यथासंभव दूरी बनाना उपयोगी हो सकता है। जिन चीजों से एलर्जी होती है, उनसे बचना भी जरूरी है।

नाक बंद होने पर कुछ लोगों को भाप लेने से थोड़ी देर के लिए राहत महसूस हो सकती है, लेकिन बहुत गर्म भाप लेने से त्वचा या सांस की नली को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। इसलिए घरेलू उपायों को इलाज का विकल्प नहीं मानना चाहिए। यदि लक्षण लंबे समय तक बने रहते हैं या बिगड़ रहे हैं, तो विशेषज्ञ की सलाह लेना सबसे उचित कदम है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट्स और सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लगातार बने रहने पर चिकित्सकीय सलाह जरूर लें।

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क्या आपको भी लगती है सुबह उठते ही तेज भूख? तो जान लीजिये इसके पीछे की 5 बड़ी वजहें https://khabardanadan.com/do-you-also-feel-hungry-as-soon-as-you-wake-up-in-the-morning-know-the-5-big-reasons-behind-it/ https://khabardanadan.com/do-you-also-feel-hungry-as-soon-as-you-wake-up-in-the-morning-know-the-5-big-reasons-behind-it/#respond Sat, 22 Aug 2026 06:56:37 +0000 https://khabardanadan.com/do-you-also-feel-hungry-as-soon-as-you-wake-up-in-the-morning-know-the-5-big-reasons-behind-it/

सुबह आंख खुलते ही अगर आपको तेज भूख महसूस होती है, तो हर बार इसे किसी बीमारी से जोड़ना जरूरी नहीं है। रात के खाने और सुबह के नाश्ते के बीच कई घंटों का अंतर होने के कारण सुबह भूख लगना शरीर की सामान्य प्रक्रिया हो सकती है। हालांकि, कुछ लोगों में यह भूख सामान्य से काफी अधिक होती है और बार-बार महसूस हो सकती है। ऐसे में इसके पीछे खान-पान, नींद और दिनचर्या से जुड़े कई कारण हो सकते हैं।

सुबह की तेज भूख को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि रात में आपने क्या और कितना खाया था, आपकी नींद कैसी रही और दिनभर आपकी शारीरिक गतिविधि कितनी रही। कुछ मामलों में लगातार बढ़ी हुई भूख किसी स्वास्थ्य समस्या से जुड़ी भी हो सकती है।

सुबह उठते ही ज्यादा भूख लगने की वजह

1. रात का भोजन कम होना
अगर रात में आपने जरूरत से कम खाना खाया है या भोजन पर्याप्त पौष्टिक नहीं था, तो सुबह शरीर को अधिक ऊर्जा की जरूरत महसूस हो सकती है। इसका असर तेज भूख के रूप में दिखाई दे सकता है।

2. डाइट में प्रोटीन और फाइबर की कमी
प्रोटीन और फाइबर पेट को लंबे समय तक भरा रखने में मदद करते हैं। रात के भोजन में इनकी कमी होने पर सुबह जल्दी भूख लग सकती है। दाल, अंडे, पनीर, दही, सब्जियां और साबुत अनाज जैसे विकल्प संतुलित डाइट का हिस्सा हो सकते हैं।

3. रात में ज्यादा मीठा या प्रोसेस्ड फूड खाना
देर रात अधिक मीठी चीजें या अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ खाने से अगले दिन भूख और खाने की इच्छा प्रभावित हो सकती है। इसलिए रात के भोजन को संतुलित रखना बेहतर माना जाता है।

4. नींद पूरी न होना
नींद की कमी शरीर में भूख और पेट भरे होने की भावना को नियंत्रित करने वाले हार्मोन को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि कम नींद लेने के बाद कुछ लोगों को अगले दिन सामान्य से ज्यादा भूख लग सकती है।

5. ज्यादा एक्सरसाइज या शारीरिक मेहनत
अगर आपने पिछले दिन सामान्य से अधिक व्यायाम किया है या ज्यादा शारीरिक मेहनत की है, तो शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता हो सकती है। ऐसे में सुबह तेज भूख लगना स्वाभाविक हो सकता है।

क्या सुबह ज्यादा भूख लगना डायबिटीज का संकेत है?

केवल सुबह तेज भूख लगने के आधार पर डायबिटीज की आशंका नहीं जताई जा सकती। लेकिन अगर भूख बढ़ने के साथ बहुत ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, बिना वजह वजन कम होना, कमजोरी या लगातार थकान जैसे लक्षण भी दिखाई दें, तो ब्लड शुगर की जांच कराना और डॉक्टर से सलाह लेना उचित है।

सुबह की भूख को संतुलित रखने के तरीके

सुबह की भूख को नियंत्रित करने के लिए सबसे पहले रात के भोजन और दैनिक दिनचर्या पर ध्यान देना जरूरी है।

रात का खाना संतुलित और पौष्टिक रखें।
भोजन में पर्याप्त प्रोटीन और फाइबर शामिल करें।
देर रात ज्यादा मीठी और अत्यधिक प्रोसेस्ड चीजें खाने से बचें।
रोज पर्याप्त और अच्छी नींद लेने की कोशिश करें।
सुबह उठने के बाद पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।
नाश्ते में सिर्फ मीठी चीजों के बजाय प्रोटीन, फाइबर और पौष्टिक कार्बोहाइड्रेट को शामिल करें।
भूख को लगातार दबाने के बजाय शरीर की जरूरत के अनुसार संतुलित भोजन करें।

कब सावधान होने की जरूरत है?

अगर सुबह की तेज भूख लंबे समय तक बनी हुई है और इसके साथ अचानक वजन बढ़ना या कम होना, अत्यधिक प्यास, बार-बार पेशाब, कमजोरी, चक्कर या बहुत ज्यादा थकान जैसे लक्षण भी नजर आ रहे हैं, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खासकर तब, जब खान-पान और दिनचर्या में कोई बड़ा बदलाव न हुआ हो और इसके बावजूद भूख असामान्य रूप से बढ़ गई हो।

ऐसी स्थिति में किसी स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेकर उचित जांच कराना बेहतर रहेगा।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए है। किसी भी लगातार या असामान्य लक्षण की स्थिति में डॉक्टर की सलाह लेना उचित है।

(साभार)

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कंघी करते ही गुच्छों में निकल रहे बाल? जानें हेयर फॉल के पीछे छिपे बड़े कारण https://khabardanadan.com/hair-coming-out-in-bunches-while-combing-know-the-major-reasons-behind-hair-fall/ https://khabardanadan.com/hair-coming-out-in-bunches-while-combing-know-the-major-reasons-behind-hair-fall/#respond Fri, 21 Aug 2026 06:43:27 +0000 https://khabardanadan.com/hair-coming-out-in-bunches-while-combing-know-the-major-reasons-behind-hair-fall/

बालों का झड़ना सामान्य तौर पर हर किसी में कुछ हद तक होता है, लेकिन जब हेयर फॉल अचानक बढ़ जाए तो इसे सिर्फ मौसम, शैंपू या हेयर केयर रूटीन से जोड़ना ठीक नहीं है। तनाव से लेकर हार्मोनल बदलाव और पोषण की कमी तक कई वजहें बालों के तेजी से गिरने के पीछे हो सकती हैं। कुछ मामलों में लगातार हेयर फॉल किसी स्वास्थ्य समस्या का संकेत भी हो सकता है। ऐसे में समस्या के कारण को समझना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है।

तेजी से बाल झड़ने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?

1. थायरॉइड में गड़बड़ी
थायरॉइड हार्मोन का असंतुलन शरीर के कई कार्यों को प्रभावित करता है और इसका असर बालों पर भी पड़ सकता है। इससे बाल कमजोर और पतले होने के साथ सामान्य से ज्यादा गिर सकते हैं। यदि हेयर फॉल के साथ लगातार थकान, कमजोरी या वजन में असामान्य बदलाव हो रहा है, तो चिकित्सकीय जांच कराना बेहतर है।

2. डाइट में पोषक तत्वों की कमी
बालों की मजबूती के लिए शरीर को पर्याप्त प्रोटीन, आयरन, जिंक और अन्य पोषक तत्वों की जरूरत होती है। लंबे समय तक पोषण की कमी रहने या बहुत कम कैलोरी वाली डाइट लेने से बालों का झड़ना बढ़ सकता है। भोजन में दालें, अंडे, डेयरी उत्पाद, हरी सब्जियां, फल, मेवे और साबुत अनाज जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल करना फायदेमंद हो सकता है।

3. तनाव और मानसिक दबाव
लंबे समय तक तनाव में रहने से शरीर के सामान्य चक्र पर असर पड़ सकता है और कुछ लोगों में इसके बाद अचानक हेयर फॉल बढ़ जाता है। गंभीर बीमारी, ऑपरेशन या शरीर पर पड़े किसी बड़े तनाव के बाद भी कुछ समय के लिए बाल ज्यादा गिर सकते हैं। कारण दूर होने के बाद कई मामलों में बालों की ग्रोथ धीरे-धीरे सामान्य हो सकती है।

4. एलोपेसिया एरियाटा
यदि सिर की त्वचा पर अचानक गोल या अंडाकार आकार के खाली हिस्से दिखाई देने लगें, तो यह एलोपेसिया एरियाटा की वजह से हो सकता है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली बालों के फॉलिकल्स को प्रभावित कर सकती है। ऐसे लक्षण नजर आने पर त्वचा विशेषज्ञ से जांच कराना जरूरी है।

5. हार्मोन में बदलाव
गर्भावस्था, डिलीवरी, मेनोपॉज या अन्य हार्मोनल बदलावों के दौरान भी बालों के झड़ने की समस्या बढ़ सकती है। खासतौर पर महिलाओं में हार्मोन से जुड़ी कुछ स्थितियों के कारण बाल पतले होने या हेयर फॉल की शिकायत हो सकती है।

6. आनुवंशिक समस्या
कई लोगों में हेयर फॉल का संबंध आनुवंशिकता से भी होता है। पुरुषों में अक्सर हेयरलाइन पीछे जाने या सिर के ऊपरी हिस्से के बाल कम होने की समस्या दिखाई देती है। वहीं महिलाओं में सिर के बीच वाले हिस्से से बाल धीरे-धीरे पतले हो सकते हैं।

इन संकेतों को दिखे तो डॉक्टर से लें सलाह

अगर बाल अचानक बहुत ज्यादा गिरने लगें, कंघी या नहाते समय गुच्छों में बाल निकलें या सिर पर गोल-गोल खाली पैच बनने लगें, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। भौंहों या पलकों के बाल भी गिर रहे हों, या स्कैल्प पर खुजली, लालिमा, जलन और पपड़ी के साथ हेयर फॉल हो रहा हो, तो डर्मेटोलॉजिस्ट से संपर्क करना बेहतर है।

हेयर फॉल का कारण जाने बिना खुद से दवा या सप्लीमेंट लेना उचित नहीं है। सही कारण की पहचान के बाद ही डॉक्टर उचित उपचार की सलाह दे सकते हैं।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए है। लगातार या असामान्य हेयर फॉल की स्थिति में योग्य चिकित्सक या त्वचा विशेषज्ञ से परामर्श लें।

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रूम फ्रेशनर की खुशबू के पीछे छिपा खतरा? ज्यादा इस्तेमाल से हो सकती हैं ये परेशानियां https://khabardanadan.com/there-is-a-hidden-danger-behind-the-fragrance-of-room-freshener-excessive-use-can-cause-these-problems/ https://khabardanadan.com/there-is-a-hidden-danger-behind-the-fragrance-of-room-freshener-excessive-use-can-cause-these-problems/#respond Tue, 18 Aug 2026 10:55:09 +0000 https://khabardanadan.com/there-is-a-hidden-danger-behind-the-fragrance-of-room-freshener-excessive-use-can-cause-these-problems/

घर, ऑफिस या कार में ताजगी और अच्छी खुशबू के लिए एयर फ्रेशनर का इस्तेमाल आम बात है। स्प्रे, डिफ्यूजर और दूसरे फ्रेगरेंस प्रोडक्ट्स कुछ ही समय में कमरे की गंध बदल देते हैं। हालांकि, इनका जरूरत से ज्यादा या लंबे समय तक इस्तेमाल करने से कुछ संवेदनशील लोगों को परेशानी हो सकती है। इसलिए कमरे को महकाने के साथ-साथ वेंटिलेशन और फ्रेगरेंस प्रोडक्ट के इस्तेमाल का ध्यान रखना भी जरूरी है।

सिर्फ बदबू को छिपाता है रूम फ्रेशनर?

एयर फ्रेशनर का मुख्य काम कमरे में खुशबू फैलाना है। यह जरूरी नहीं कि बदबू पैदा करने वाले स्रोत को खत्म कर दे। कई फ्रेगरेंस प्रोडक्ट्स से अलग-अलग वाष्पशील कार्बनिक यौगिक यानी VOCs हवा में फैल सकते हैं। कुछ परिस्थितियों में इनके अलावा अन्य उत्सर्जन भी बढ़ सकते हैं।

हर व्यक्ति पर इसका प्रभाव एक जैसा नहीं होता, लेकिन संवेदनशील लोगों में तेज खुशबू या ऐसे उत्पादों के संपर्क से कुछ परेशानियां महसूस हो सकती हैं।

किन समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है?

कुछ लोगों को एयर फ्रेशनर या तेज खुशबू वाले उत्पादों के इस्तेमाल के बाद सिरदर्द, आंख-नाक या गले में जलन, छींक, खांसी, मतली अथवा चक्कर जैसी दिक्कत महसूस हो सकती है। संवेदनशील व्यक्तियों में सांस से जुड़ी परेशानी भी बढ़ सकती है।

एयर फ्रेशनिंग प्रोडक्ट्स पर हुए अध्ययनों में स्प्रे और डिफ्यूजर के इस्तेमाल के दौरान VOCs, कार्बोनिल्स और PM2.5 जैसे उत्सर्जनों को मापा गया है। सामान्य परिस्थितियों में लगातार स्वास्थ्य जोखिम को लेकर निष्कर्ष स्पष्ट नहीं हैं, जबकि कुछ परिस्थितियों में प्रदूषकों का स्तर बढ़ने की चिंता सामने आई है। इस विषय पर शोध अभी जारी है।

इन लोगों को रखनी चाहिए ज्यादा सावधानी

अस्थमा से परेशान लोग: तेज खुशबू कुछ लोगों में अस्थमा के लक्षणों को बढ़ा सकती है।

सांस की बीमारी वाले लोग: COPD या अन्य श्वसन संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों को फ्रेगरेंस से खांसी या सांस लेने में परेशानी हो सकती है।

एलर्जी से संवेदनशील लोग: कुछ व्यक्तियों में सुगंधित उत्पादों के संपर्क से एलर्जिक प्रतिक्रिया हो सकती है।

माइग्रेन या खुशबू से सिरदर्द होने वाले लोग: अगर किसी खास फ्रेगरेंस के इस्तेमाल के बाद बार-बार सिरदर्द होता है, तो उसका इस्तेमाल कम करना या बंद करना बेहतर है।

क्या एयर फ्रेशनर का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दें?

ऐसा कहना सही नहीं होगा कि हर व्यक्ति के लिए एयर फ्रेशनर नुकसानदायक है। इसका प्रभाव व्यक्ति की संवेदनशीलता, उत्पाद की संरचना और एक्सपोजर की मात्रा पर निर्भर कर सकता है। एयर फ्रेशनर से फेफड़ों को सीधे नुकसान पहुंचने की बात अभी पूरी तरह स्थापित नहीं है और इस दिशा में अध्ययन जारी हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, कमरे की खराब गंध को केवल खुशबू से ढकने के बजाय उसके स्रोत को दूर करना ज्यादा बेहतर तरीका है।

कमरे को प्राकृतिक तरीके से रखें फ्रेश

कमरे की हवा बेहतर रखने के लिए कुछ आसान उपाय अपनाए जा सकते हैं—

खिड़की और दरवाजे खोलकर पर्याप्त वेंटिलेशन रखें।
कमरे में ताजी हवा का आवागमन बनाए रखें।
कूड़ा समय पर बाहर निकालें।
नमी और फफूंदी को नियंत्रित करें।
बेडशीट, पर्दे और कालीन नियमित रूप से साफ करें।
जरूरत न होने पर एयर फ्रेशनर और खुशबूदार मोमबत्तियों का इस्तेमाल कम करें।
फ्रेगरेंस प्रोडक्ट इस्तेमाल करते समय पैकेज पर दिए निर्देशों का पालन करें।

डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और अध्ययनों के आधार पर तैयार किया गया है। किसी खास स्वास्थ्य समस्या या लक्षण की स्थिति में डॉक्टर की सलाह लेना उचित है।

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मोबाइल देखते-देखते सिरदर्द क्यों होता है? स्क्रीन के साथ ये आदतें भी हैं जिम्मेदार https://khabardanadan.com/why-does-one-get-headache-while-watching-mobile-along-with-the-screen-these-habits-are-also-responsible/ https://khabardanadan.com/why-does-one-get-headache-while-watching-mobile-along-with-the-screen-these-habits-are-also-responsible/#respond Mon, 17 Aug 2026 06:38:39 +0000 https://khabardanadan.com/why-does-one-get-headache-while-watching-mobile-along-with-the-screen-these-habits-are-also-responsible/

आज के डिजिटल दौर में मोबाइल, लैपटॉप और कंप्यूटर के बिना कामकाज की कल्पना करना मुश्किल है। पढ़ाई से लेकर ऑफिस के काम और मनोरंजन तक, दिन का बड़ा हिस्सा स्क्रीन के सामने गुजरता है। लगातार स्क्रीन देखने के बाद सिरदर्द या आंखों में भारीपन महसूस होना आम बात है, लेकिन इसके पीछे सिर्फ स्क्रीन ही जिम्मेदार हो, यह जरूरी नहीं है। हमारी नींद, खान-पान, पानी पीने की आदत और बैठने का तरीका भी सिरदर्द को प्रभावित कर सकता है।

सीनियर कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट और यूनिट हेड डॉ. नेहा पंडिता के अनुसार, लंबे समय तक स्क्रीन के इस्तेमाल के साथ अगर शरीर को पर्याप्त आराम नहीं मिलता, तो सिरदर्द और मानसिक थकान जैसी परेशानियां बढ़ सकती हैं। इसलिए स्क्रीन टाइम के साथ रोजमर्रा की आदतों पर भी ध्यान देना जरूरी है।

लगातार स्क्रीन देखने से क्यों हो सकता है सिरदर्द?

लंबे समय तक मोबाइल या कंप्यूटर स्क्रीन पर लगातार नजर टिकाए रखने से आंखों पर दबाव पड़ सकता है। स्क्रीन देखते समय हम सामान्य से कम पलकें झपकाते हैं, जिससे आंखों में सूखापन, जलन और थकान महसूस हो सकती है। स्क्रीन की तेज रोशनी या ग्लेयर भी कुछ लोगों में असहजता और सिरदर्द की वजह बन सकता है।

गलत पॉश्चर भी बढ़ा सकता है परेशानी

मोबाइल को लगातार नीचे करके देखने या लैपटॉप पर झुककर काम करने की आदत गर्दन और कंधों पर अतिरिक्त दबाव डालती है। लंबे समय तक ऐसी स्थिति में रहने से मांसपेशियों में तनाव पैदा हो सकता है, जिसका असर सिरदर्द के रूप में दिखाई दे सकता है।

माइग्रेन से परेशान लोगों को ज्यादा सावधानी

जिन लोगों को माइग्रेन की शिकायत रहती है, उनके लिए तेज रोशनी और लंबे समय तक स्क्रीन देखना संभावित ट्रिगर हो सकता है। हालांकि स्क्रीन के साथ-साथ तनाव, नींद की कमी, पर्याप्त पानी न पीना और लंबे समय तक भूखे रहना भी माइग्रेन की समस्या को बढ़ा सकता है।

रात में मोबाइल चलाने से नींद पर असर

बिस्तर पर जाने के बाद लंबे समय तक फोन पर वीडियो देखना या सोशल मीडिया स्क्रॉल करना नींद के समय को कम कर सकता है। नींद पूरी न होने पर अगले दिन थकान, चिड़चिड़ापन, ध्यान लगाने में परेशानी और मानसिक सुस्ती महसूस हो सकती है। इसलिए सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाना बेहतर आदत हो सकती है।

क्या ज्यादा स्क्रीन टाइम से याददाश्त कमजोर होती है?

सामान्य स्क्रीन इस्तेमाल को सीधे तौर पर दिमाग को नुकसान पहुंचने या याददाश्त कमजोर होने से जोड़ना सही नहीं माना जाता। हालांकि लगातार नोटिफिकेशन, बार-बार काम बदलना और देर रात तक स्क्रीन इस्तेमाल करने से मानसिक थकान बढ़ सकती है। ऐसे में व्यक्ति को लग सकता है कि उसकी याददाश्त कमजोर हो रही है, जबकि असल समस्या ध्यान और एकाग्रता में कमी हो सकती है।

स्क्रीन इस्तेमाल करते समय इन बातों का रखें ध्यान
लंबे समय तक लगातार स्क्रीन देखने से बचें और बीच-बीच में छोटे ब्रेक लें।
पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें और भोजन समय पर करें।
मोबाइल या लैपटॉप इस्तेमाल करते समय गर्दन को ज्यादा झुकाने से बचें।
स्क्रीन पर पड़ने वाली तेज रोशनी और ग्लेयर को कम करने की कोशिश करें।
सोने से पहले कुछ समय फोन और दूसरी स्क्रीन से दूरी रखें।
अगर स्क्रीन देखने के बाद बार-बार सिरदर्द होता है, तो इसके पैटर्न और संभावित कारणों पर ध्यान दें।

इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें

अगर सिरदर्द अचानक बहुत तेज हो, लगातार बढ़ रहा हो या उसके साथ कमजोरी, शरीर के किसी हिस्से में सुन्नपन, भ्रम, दौरे, बेहोशी, बोलने में परेशानी या नजर में गंभीर बदलाव जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

कुल मिलाकर, सिरदर्द को केवल स्क्रीन टाइम से जोड़ना सही नहीं होगा। स्क्रीन के साथ हमारी नींद, तनाव, खान-पान, पानी की मात्रा और बैठने का तरीका भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए स्क्रीन कम करने के साथ-साथ स्वस्थ दिनचर्या बनाए रखना भी जरूरी है।

नोट: यह लेख उपलब्ध मेडिकल जानकारी और विशेषज्ञ की बताई गई बातों के आधार पर तैयार किया गया है। किसी भी गंभीर या लगातार बनी रहने वाली समस्या में डॉक्टर से सलाह लें।

(साभार)

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टूथब्रश बदलने में न करें देरी, जानें कितने महीने बाद लेना चाहिए नया ब्रश https://khabardanadan.com/do-not-delay-in-changing-toothbrush-know-after-how-many-months-you-should-get-a-new-brush/ https://khabardanadan.com/do-not-delay-in-changing-toothbrush-know-after-how-many-months-you-should-get-a-new-brush/#respond Fri, 14 Aug 2026 06:56:09 +0000 https://khabardanadan.com/do-not-delay-in-changing-toothbrush-know-after-how-many-months-you-should-get-a-new-brush/

ओरल हेल्थ के लिए नियमित ब्रश करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी सही समय पर टूथब्रश बदलना भी है। कई लोग ब्रश के ब्रिसल्स पूरी तरह घिस जाने तक उसी टूथब्रश का इस्तेमाल करते रहते हैं। हालांकि, समय के साथ ब्रिसल्स की स्थिति खराब होने से दांतों की सफाई पहले जैसी प्रभावी नहीं रह सकती। इसलिए टूथब्रश की हालत पर ध्यान देना जरूरी है।

कितने समय में बदलें टूथब्रश?

आमतौर पर हर 3 से 4 महीने में टूथब्रश बदलने की सलाह दी जाती है। हालांकि, अगर इससे पहले ही ब्रिसल्स फैलने, मुड़ने या घिसने लगें, तो नया ब्रश इस्तेमाल करना बेहतर है। जो लोग ब्रश करते समय अधिक दबाव डालते हैं, उनके टूथब्रश के ब्रिसल्स जल्दी खराब हो सकते हैं।

ब्रिसल्स देखकर ऐसे पहचानें पुराना ब्रश

टूथब्रश बदलने का संकेत उसके ब्रिसल्स भी देते हैं। अगर ब्रिसल्स बाहर की ओर फैल गए हैं, मुड़ गए हैं या उनकी लंबाई और आकार में स्पष्ट बदलाव दिखाई दे रहा है, तो ब्रश बदलने का समय आ गया है। खराब हो चुके ब्रिसल्स दांतों की सतह और मसूड़ों की लाइन की सफाई उतनी अच्छी तरह नहीं कर पाते।

ज्यादा पुराना ब्रश इस्तेमाल करने का नुकसान

समय के साथ टूथब्रश के ब्रिसल्स अपनी प्रभावशीलता खो सकते हैं, जिससे प्लाक हटाने की क्षमता प्रभावित होती है। वहीं, बहुत जोर लगाकर ब्रश करने से मसूड़ों में जलन और दांतों की बाहरी सतह पर घिसाव की समस्या भी हो सकती है। इसलिए सॉफ्ट-ब्रिसल वाले टूथब्रश का इस्तेमाल करते हुए हल्के हाथ से ब्रश करना बेहतर माना जाता है।

दिन में कितनी बार करें ब्रश?

दांतों की बेहतर सफाई के लिए दिन में दो बार करीब 2 मिनट तक ब्रश करना सामान्य सलाह है। सॉफ्ट-ब्रिसल वाले ब्रश और फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट का इस्तेमाल किया जा सकता है। ब्रश करते समय दांतों के साथ मसूड़ों की लाइन को भी धीरे-धीरे साफ करना चाहिए।

टूथब्रश को रखने का सही तरीका

ब्रश करने के बाद टूथब्रश को साफ पानी से धोकर सीधा ऐसी जगह रखना चाहिए जहां वह अच्छी तरह सूख सके। इसे लंबे समय तक गीला और बंद डिब्बे में रखने से बचना चाहिए। टूथब्रश को अन्य लोगों के ब्रश से अलग रखना भी जरूरी है।

इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें

अगर मसूड़ों से बार-बार खून आता है, उनमें सूजन रहती है, दांतों में लगातार दर्द या संवेदनशीलता महसूस होती है या मुंह से लंबे समय तक दुर्गंध आती है, तो सिर्फ टूथब्रश बदलना पर्याप्त नहीं है। ऐसी स्थिति में दंत चिकित्सक से जांच कराना उचित रहेगा।

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए है। किसी भी दांत या मसूड़ों की समस्या के लिए योग्य डेंटिस्ट की सलाह लें।

(साभार)

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